मंगलवार, 30 नवंबर 2010

इस कठिन दौर में-पंच परमेश्‍वर



%आंदोलनों के लिए यह कठिन समय है। आंदोलनकारी को व्यवस्था में व्यवधान पैदा करने वाले तत्व के रूप में स्थापित करने की भरसक कोशिशें पूरी दुनिया में हो रही हैं। जब-जब समाज उपभोक्तावादी होता है, सत्ता ताकतवर होती जाती है। ऐसे समय में सत्ता द्वारा आंदोलनों को बदनाम करने में सहूलियत मिल जाती है। इसका ताजा उदाहरण दिल्ली विष्वविद्यालय षिक्षक संघ द्वारा गैर कानूनी सेमेस्टर प्रणाली के खिलाफ विगत आठ महीने से चलाया जा रहा आंदोलन है। प्रो0 दीपक पेंटल ने पिछले साल सेमेस्टर प्रणाली को सभी पाठ्यक्रमों में अचानक लागू करने का मन बनाया और हर सत्तावादी की तरह उन्हें अनुमान था कि वे इसे बड़ी सहजता से पास करवा लेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। दिल्ली विश्‍विद्यालय के शिक्षक अपनी अलग-अलग विचारधारा और राजनीतिक संबद्धता के बावजूद एक मंच पर इकट्ठे हुए और इसका प्रतिवाद किया। आज विद्यार्थी भी इस विरोध में शामिल हो गए हैं।
अट्ठाइस अक्टूबर को शिक्षकों ने भारी संख्या में मंडी हाउस से संसद तक केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की निश्क्रियता के विरुद्ध मार्च निकाला और अपना कार्यकाल पूरा कर चुके कुलपति को तत्काल पदच्युत करने की मॉंग की थी।
इस बीच हम शिक्षक अपने विद्यार्थियों और आम लोगां के बीच बदनाम किए जाते रहे कि हम कक्षाएँ नहीं लेना चाहते। हकीकत यह है कि सेमेस्टर प्रणाली लागू होने से वर्क-लोड में कमी और छुट्टियों में इजाफा हो रहा है। कुलपति महोदय -इस लेख के छपने तक वे निवर्तमान हो गए हैं-और कपिल सिब्बल का तर्क इससे खारिज हो जाता है।
आखिर अनेक छोटे-छोटे मसलों पर अपनी जुदा राय रखने वाले और गर्मागर्म बहस करने वाले शिक्षक संगठन इस मुद्दे पर एक क्यों हो गए? कारण साफ है कि विश्‍व विद्यालय में पाठ्यक्रमों के निर्माण तथा सेमेस्टर प्रणाली को अपनाए जाने हेतु जिस लोकतांत्रिक प्रकिया को अपनाया जाना चाहिए था उसका अनुपालन अधिकारियों ने नहीं किया। इस मसले पर कमोवेष तानाशाही रवैया ही विश्‍वविद्यालय अधिकारियों का रहा। यह रवैया इसलिए भी इन अधिकारियों ने अपनाया कि पद और लाभ के लिए षिक्षक संगठनों में फूट डालना उन्हें आसान दिख रहा होगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। छोटे-छाटे संगठनों ने भी पूरी ईमानदारी और मुस्तैदी से कुलपति के गैर लोकतांत्रिक और तानाशाही रवैये का प्रतिवाद किया।
दिल्ली विश्‍वविद्यालय के नियमित कॉलेजों के अतिरिक्त पत्राचार और नॉन कालिजिएट अध्यापन में बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते हैं। यहॉं फीस के तौर पर औसतन दस से पच्चीस हजार रूपये सालाना में विद्यार्थी अपनी पढ़ायी पूरी कर लेता है। देश की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में उसकी सफलता सराहनीय रही है। यानी वार्षिक परीक्षा प्रणाली अपेक्षा के अनुकूल संचालित हो रही है जिसके चलते अमेरिकी राष्‍ट्पति भयभीत दीखते हैं और अपने यहॉं शिक्षा सुधार की बात करते हैं। अब इस सुचारू रूप से चलती हुई शिक्षा प्रणाली में मट्ठा घेालने का काम महज एक प्रयोग करने और कुछ एडवेंचर जैसा करने के लिए कदापि न होना चाहिए।
अट्ठाइस अक्टूबर को ही जब मार्च समापन की ओर था तो जनआंदोलनों के राश्ट्रीय समन्वय के नर्मदा घाटी में आयोजित एक कार्यक्रम से हिस्सा लेकर लौटे अजित झा ने राय जाहिर की कि दिल्ली विश्‍वविद्यालय जैसे बड़े विश्‍वविद्यालय में सेमेस्टर प्रणाली कारगर नहीं हो सकती। उनकी बात सच है। लाखों की सख्या में विद्यार्थियों को शिक्षित करने का काम सेमेस्टर द्वारा नहीं हो सकता। अंततः होगा यह कि विश्‍वविद्यालय एक और सुधार की मॉंग करेगा और फालतू के विद्यार्थियों से पल्ला झाड़ना चाहेगा। ये विद्यार्थी निजी विष्वविद्यालयों की षरण में होंगे और उनके मुनाफे को चार चॉंद लगाएँगे। मोटी रकम देकर शिक्षा पाया विद्यार्थी देश-दुनिया के बारे में न सोच अपनी जेब भरने की दिषा में कदम रखेगा। मुझे अपने शिक्षक स्व0 दीपक सिन्हा याद आते हैं जो वैकल्पिक सोच के धुरंधर प्रवक्ता थे। वे सत्ता और व्यवस्था खिलाफ लगातार आवाज उठाने की प्रेरणा देते रहे और आज मेरे जैसे कई विद्यार्थी उन्हीं की ट्रेनिंग के चलते इस पेशे में हैं अन्यथा कोई और धंधा कर रहे होते। समेस्टर प्रणाली एक परजीवी पौध रोपने जा रही है जो अपने लिए नहीं बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के लिए मुनाफा बनाने के लिए जीवित रहेगी।
संघर्श और प्रतिरोध के स्वर के स्वर इसके जरएि हमेशा के लिए मौन कर दिया जाएगा।
सेमेस्टर प्रणाली गरीब विद्यार्थियों को दिल्ली विश्‍वविद्यालय से विस्थापित करेगी और उनमें से अधिकांशतः उच्च शिक्षा पाने से वंचित भी हो जाएंगें। इस अकादमिक सत्र का बड़ा समय जाया हो चुका है। समय आ गया है कि अब षिक्षक और छात्रों की जमात को विश्‍वविद्यालय अपनी बातचीत में शामिल करें और सेमेस्टर किन पाठ्यक्रमों के लिए उपयागी हो सकती है इसपर विचार करे।नए कुलपति का आगमन का आगमन हो चुका है और कोर्ट का फैसला भी।पंच परमेश्‍वरों ने पुराने कुलपति की बातों को जायज ठहराया है।शिक्षक अपने काम पर सिमेस्‍टर के तहत लौट आए हैं, पर बात खत्‍म नहीं हुई है। इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। लोकतंत्र अडियल रुख से नहीं संवाद और बातचीत से चलता है और शिक्षक लोकतंत्र का प्रहरी भी न बन सका तो वह अपने आप को क्या मुँह दिखाएगा और अपने विद्यार्थियों को क्या पढ़ाएगा।